سَكَنٌ ساكنُ سوادَ الفؤادِ
| سَكَنٌ ساكنُ سوادَ الفؤادِ | ملَّ قُربي ومال نحو بعادي |
| قال لم لا تنام قلت لا عرا | ضك وهو الخلافُ للمعتادِ |
| إنّما اشتهي الكرى لأَرى | طيفَكَ فيه وأنت سَهلُ القيادِ |
| فإذا لم يَزُر خيالك إلاّ | مُغضباً فالكرى فداء السُّهادِ |
| سَكَنٌ ساكنُ سوادَ الفؤادِ | ملَّ قُربي ومال نحو بعادي |
| قال لم لا تنام قلت لا عرا | ضك وهو الخلافُ للمعتادِ |
| إنّما اشتهي الكرى لأَرى | طيفَكَ فيه وأنت سَهلُ القيادِ |
| فإذا لم يَزُر خيالك إلاّ | مُغضباً فالكرى فداء السُّهادِ |