عمى ألوان
| للغيم ِ أكتبُ للأمطار ِ للشجرِ | ليلا ً يسامرني ، من هفوة ِ الضجر ِ |
| حرفا ً يهاجرُ في اللاشيء ، يكتبني | شيئا ً ، و يحملني ، غصنا ً بلا ثمرِ |
| ظلا ً يفتش في الجدران عن لون ٍ | وطنا ً يلاحِقُ آلافا ً من الغجر ِ |
| قلبا ً يحذرني : في الحب كن حجرا ً | و هل يفيدُ إذا أحببتهُ حذري ؟! |
| و كيف أقسو إذا أُشْرِبْتُ من وله ٍ | حبا ً ، تفجّر من إيماءة ِ الحجر ِ |
| و قد أحبُّ فؤادي حين أملكهُ | فلستُ أعرفُ إلا نزوة البشر. |